नई दिल्ली। आजादी के बाद से या कहें अंग्रेजों के समय भी सरकारें अमीरों से ज्यादा और गरीबों से कम से कम टैक्स वसूलती थीं। विदेशों में भी अमीरों पर सुपररिच टैक्स के पीछे भी गरीबों को राहत देने का फलसफा है। माना जाता है कि गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों की आय दो वक्त की रोटी तक ही सीमित रहती है, इसलिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से टैक्स वसूलने में इस वर्ग को सरकारों द्वारा रियायत दी जाती है। मगर मोदी सरकार ने अब इस धारणा को पूरी तरह से बदल दिया है। पिछले पांच साल में सरकार ने टैक्स वसूलने के जो नियम बनाये है, उसमें पूंजीपति ऐश कर रहे हैं। गरीबो मध्यम वर्ग टैक्स के बोझ से दबता जा रहा है। सबसे बड़ा उदाहरण पेट्रोल-डीजल है। यह ऐसा उत्पाद है, जो गरीब हो या अमीर दोनों को लेना पड़ता है। कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से जब देश में ज्यादातर लोगों की आमदनी में घट रही थी, तब राहत देने की बजाय सरकार ने महंगे पेट्रोल-डीजल का बोझ डाल आम जनता पर डाल दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि पहली बार सरकार को आयकर एवं कारपोरेट टेक्स से ज्यादा कमाई, पेट्रोल-डीजल पर लगाए गए टैक्स से हुई है। इसका बोझ आम जनता पर पड़ा है।
इस तरह से बढ़ी कमाई
आंकड़ों के मुताबिक आयकर के रूप में लोगों ने 4.69 लाख करोड़ रुपए भरे, जबकि पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी और वैट के रूप में 5.25 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा चुकाने पड़े। वहीं, कंपनियों ने इस दौरान मात्र 4.57 लाख करोड़ रुपए कॉरपोरेट टैक्स भरा। पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज और वैट के अलावा आधा दर्जन से ज्यादा छोटे टैक्स, शुल्क व सेस लगते हैं, जो इससे अलग हैं।
पहली बार कॉरपोरेट से ज्यादा आयकर
वहीं, इसी दौरान सरकारी खजाने में आयकर के रूप में 4.69 लाख करोड़ रुपए आए। जबकि कंपनियों ने कॉरपोरेट टैक्स के रूप में 4.57 लाख करोड़ रुपए ही जमा किए। वित्त वर्ष 2019-20 में पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज, वैट के रूप में 4.23 लाख करोड़ रुपए वसूले गए। आयकर 4.80 लाख करोड़ रुपए आया। जबकि कंपनियों ने सर्वाधिक 5.56 लाख करोड़ रुपए कॉरपोरेट टैक्स के रूप में भरा। खास बात यह है कि 2020-21 में पेट्रोल-डीजल की बिक्री इससे पहले के वर्ष से 10.50 फीसदी कम होने के बावजूद सरकार की टैक्स से कमाई बेतहाशा बढ़ी हुई है।
राज्यों से ज्यादा कमाई केंद्र की
वित्त वर्ष 2020-21 में पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री से सरकार को 5.25 लाख करोड़ रुपए टैक्स मिला। इसमें केंद्र सरकार की ओर से वसूली गई एक्साइज ड्यूटी और राज्यों का वैट शामिल है। वैट का आंकड़ा सिर्फ दिसंबर तक का है। यानी मार्च तिमाही में राज्यों को हुई आमदनी इसमें शामिल नहीं है। 2014-15 में जहां सभी राज्यों का वैट एक करोड़ 37 हजार रुपए था, वह अब लगभग 2 लाख करोड़ होगा। दिसम्बर माह तक का आंकड़ा 1 करोड 35 हजार पर पहुंचा है। पिछले वर्ष की तुलना में 3 माह का आकड़ा 2 लाख करोड़ तक पहुंचेगा।
निम्न एवं मध्यम वर्ग पर टेक्स का बोझ
माना जाता है कि गरीबों पर सरकार कोई टेक्स नहीं लगाती है। जीएसटी आने के बाद 18 से 28 फीसदी टेक्स गरीबों एवं मध्यमवर्गीय परिवारों से वसूला जा रहा है। शराब, बिड़ी सिगरेट इत्यादि पर पिछले 7 वर्षों में सबसे ज्यादा टेक्स बढ़ाया गया। पेट्रोल एवं डीजल पर भी इन्हीं 7 वर्षों में सबसे ज्यादा टेक्स आम जनता से वसूला जा रहा है। किसान-मजदूर, व्यापारी, नौकरी पेशा से जुड़े लोग ही सबसे ज्यादा टेक्स दे रहे हैं। महंगाई आसमान को छू रही है। गरीब एवं मध्यमवर्गीय परिवारों की बचत खत्म हो गई। वह कर्जों में डूब गए हैं। वहीं अमीरों की दौलत दिन-दूनी और रात चौगनी की गति से बढ़ रही है।

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