नई दिल्ली। असम की विधान सभा में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा द्वारा पेश किए गए एक बिल के मुताबिक, अब असम में मंदिरों के आसपास के 5 किलोमीटर के इलाके में बीफ बेचना और खरीदना गैर कानूनी हो जाएगा। अगर ये बिल कानून बन गया तो इसका उल्लंघन करने वाले को 3 से 8 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। साथ ही उन पर 5 लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। अब विपक्षी पार्टियों का कहना है कि इस नए कानून के जरिए असम की सरकार मुसलमानों को निशाना बनाएगी। गायों की सुरक्षा से जुड़े इस बिल की वजह से असम में एक बार फिर हिंदू और मुसलमानों के नाम पर राजनीति की दुकानें खुल गई हैं।
2011 के सेंसस के मुताबिक, असम भारत का वो राज्य है जहां मुस्लिम जनसंख्या सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। फिलहाल असम की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 61 प्रतिशत है, जबकि मुसलमानों की जनसंख्या 34 प्रतिशत है। असम के 27 में से 9 जिलों में इस्लाम सबसे बड़ा धर्म बन चुका है। असम में मुसलमान आबादी तेजी से बढ़ने के लिए बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ को भी जिम्मेदार माना जाता है क्योंकि, असम, बांग्लादेश के साथ 263 किलोमीटर लंबा बॉर्डर शेयर करता है और यही वजह है कि असम में पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिमों के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियों का तेजी से उदय हुआ है। इनमें ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीई) जैसी पार्टियां भी शामिल हैं, जो कांग्रेस के साथ मिलकर इस नए बिल का विरोध कर रही हैं।
नए बिल के मुताबिक, असम में हिंदुओं, जैन और सिखों को धर्म स्थल के आस पास के 5 किलोमीटर इलाके में बीफ की खरीद और बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। इसके अलावा असम में मौजूद सत्र के आस पास भी बीफ की खरीद और बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। सत्र उन मठों को कहते हैं कि जिनकी स्थापना 16वीं शताब्दी के कवि और संत शंकरदेव ने की थी। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के 2015 के सर्वे के मुताबिक, भारत के 40 प्रतिशत मुसलमान बीफ खाते हैं, जबकि ऐसा करने वाले ईसाइयों की संख्या 26 प्रतिशत और बीफ खाने वाले हिंदुओं की संख्या 2 प्रतिशत है। वैसे एक सच ये भी है पूरे भारत में बीफ खाने वाले हिंदुओं की संख्या तेजी से कम हो रही है, जबकि असम अकेला एक ऐसा राज्य है, जहां बीफ खाने वाले हिंदुओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। फिर भी अगर इस आंकड़े को आधार मान लिया जाए, तो असम के 34 प्रतिशत मुसलमानों को ये सोचना चाहिए कि क्या वो 61 प्रतिशत हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए मंदिरों के आस पास बीफ पर लगने वाले कानूनी प्रतिबंध से सहमत नहीं हो सकते? और क्या सेकुलरिज्म के नाम पर एक धर्म को संरक्षण और दूसरे धर्म की भावनाएं आहत करने का हक राजनेताओं को दिया जा सकता है?














