लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव 2022 में होने हैं, लेकिन पंचायत चुनाव परिणामों ने बड़े दलों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पंचायत चुनाव में राजनीतिक दलों ने जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए अधिकृत प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन निर्दलीयों ने खासी संख्या में परचम फहरा दिया। इस उठापटक ने राजनीतिक दलों को छोटे दलों की ओर देखने को फिर से मजबूर किया है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सभी पार्टियों की कोशिश रहेगी कि छोटे दलों के साथ समझौता हो। इसबीच दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह का अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी के नेताओं से मिलना बताता है कि गठबंधन पॉलिटिक्स शुरु हो चुकी है। भाजपा के मुकाबले अपनी मजबूती साबित करने के लिए उत्तर प्रदेश के सभी प्रभावी दलों को भी गठबंधन की जरूरत है। वैसे तो उत्तर प्रदेश में वर्ष 2002 से ही छोटे दलों ने गठबंधन की राजनीति शुरू कर जातियों को सहेजने की पुरजोर कोशिश की है, लेकिन इसका सबसे प्रभावी असर 2017 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। जब राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय दलों के अलावा करीब 290 पंजीकृत दलों ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। भाजपा ने 2017 में अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के साथ गठबंधन का प्रयोग किया था। भाजपा को 312, सुभासपा को 4 और अपना दल एस को 9 सीटों पर जीत मिली थी। अब एकबार फिर राजभर पर सभी दल डोरे डाल रहे हैं। राजभर अभी पत्ता नहीं खोल रहे हैं। ओमप्रकाश राजभर का मानना है कि देश में अभी गठबंधन की राजनीति का दौर है इसलिए हमने भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाया है। इसमें दर्जन भर से ज्यादा दल शामिल हैं। प्रदेश में कांग्रेस भी इस बार छोटे दलों से समझौता करने की तैयारी कर रही है। दूसरी तरफ बीएसपी की भी कोशिश होगी कि गठबंधन हो। फिलहाल इनका पत्ता भी अभी खुला नहीं है।

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