भोपाल । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आनुषंगिक संगठन भारतीय किसान संघ कृषि कानूनों को मौजूदा स्वरूप में लागू किए जाने के पक्ष में नहीं है। संगठन ने सरकार को सुझाव दिया है कि सुधार करके इसे लागू किया जाए, तभी यह किसानों के लिए लाभकारी होंगे। कानूनों को रद्द करने की जगह सुधार हो। कृषि व्यापार में खुली प्रतिस्पर्धा के तहत होना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य का कानूनी प्रविधान होना चाहिए। इसके लिए ऐसी व्यवस्था बने कि यह सिर्फ सरकारी खरीद नहीं बल्कि सब पर लागू हो। खेती से जुड़े विवादों के निराकरण के लिए जिला स्तर पर कृषि न्यायालय हों। सरकार समाधान की दिशा में बढ़ रही है पर आंदोलन में गए लोग सिर्फ हां-ना में बात कर रहे हैं। ऐसे में वार्ता नहीं हो सकती है। यह बात भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी ने शुक्रवार को भोपाल स्थित संघ कार्यालय में पत्रकारवार्ता में कही।
उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों को लेकर भारतीय किसान संघ अपने मत पर अडिग है। संघ ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि कृषि व्यापार खुली प्रतिस्पर्धा के तहत होना चाहिए। इसके लिए त्रिस्तरीय कृषि व्यापार व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें सरकारी की खरीद, निजी व्यापारियों की खरीद और कृषि उपज मंडियों के माध्यम से खरीद होना चाहिए।
समर्थन मूल्य का लाभ किसान को होना चाहिए पर यह तभी हो सकता है जब इसके लिए केवल सरकारी खरीद नहीं बल्कि एक कानूनी व्यवस्था बन जाए। निजी व्यापारी के लिए भी यह बंधन होना चाहिए। उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां यह प्रविधान है कि समर्थन मूल्य से नीचे कोई बोली नहीं लगेगी पर कानूनी आधार नहीं होने से पालन नहीं होता है। सही मायने में पेच एमएसपी पर फंसा हुआ है।
एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि अक्टूबर और नवंबर में किसानों को 1,900 करोड़ रुपये का किसानों को कम कीमत मिलने से नुकसान हुआ है। कानून में व्यापारियों को किसानों को खेत में जाकर उपज खरीदने का प्रविधान किया है। कई बार किसानों के साथ धोखा हो जाता है। इसमें लायसेंसिंग की बात हम नहीं कर रहे हैं पर पंजीयन होना चाहिए। सिर्फ पैनकार्ड होने भर से बात नहीं चलेगी। केंद्र या राज्य सरकार के स्तर पर पंजीयन हो जाए और बैंक सिक्योरिटी हो ताकि गड़बड़ हो जाती है तो वो पकड़ में आ जाए। खेती से जुड़े विवादों के निराकरण के लिए अलग से व्यवस्था होनी चाहिए। सरकार ने घिसी-पिटी एसडीएम वाली व्यवस्था दी है।
अलग से जिला स्तर पर कृषि न्यायालय की व्यवस्था होना चाहिए। आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन की बात संघ भी उठा रहा था पर सरकार ने जो संशोधन किया है वो अलग दिशा में चला गया है। अकाल, बाढ़, युद्ध की स्थिति या नाशवान वस्तुओं में सौ फीसद और दालों में पचास फीसद कीमत बढऩे पर कानून लागू होगा। बड़े उद्योगों को छूट मिली है जो निर्यात करते हैं। यह बात समझ में नहीं आ रही है। ऐसे में कानून का दुरुपयोग होकर जमाखोरी हो सकती है। इस कानून में इस तरह की छूट नहीं होना चाहिए।
किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर चलने वाला आंदोलन हो गया
संघ के संगठन मंत्री ने किसान संगठनों के आठ दिसंबर को भारत बंद आंदोलन से दूर रहने पर कहा कि हम अगस्त से अपना काम कर रहे हैं। अध्यादेश आने के बाद सुधार को लेकर सरकार को सुझाव दिए हैं। आंदोलन को लेकर कहा कि शुरुआत से ही किसानों के कंधों पर बंदूक रखकर चलाने की बात हो रही थी।
पूर्व केंद्रीय शरद पवार ने इसका विरोध किया। जबकि, उन्होंने पहले खुद कहा है कि किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है इसलिए राहत देनी चाहिए। अब राजनीति ज्यादा हो रही है। पंजाब में सिर्फ धान और गेहूं की समर्थन मूल्य की बात कानून में है तो सवाल उठता है कि क्या वहां अन्य फसल नहीं होती है। राजस्थान सरकार ने समर्थन मूल्य की गारंटी सिर्फ अनुबंध खेती के लिए दी है। यह किसानों की आंखों में धूल झोंकने का काम है। यह आंदोलन राजनीतिक दिशा में जाने वाला है। ब्लेक एंड व्हाइट में बात नहीं हो सकती है। अब अच्छी बात यह हो गई है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है। अभी तक सबका प्रयास सिर्फ वार्ता को असफल करने का चल रहा था। कोर्ट ने समिति बनाने का जो सुझाव दिया है, उसका भारतीय किसान संघ स्वागत करता है। इसमें भारतीय किसान संघ सहित मान्यता प्राप्त संगठनों को रखा जाए।













