बिहार विधानसभा चुनाव l को लेकर आए तमाम एग्जिट पोल में अनुमान लगाया गया है कि महागठबंधन को सत्ता मिलने वाली है और 15 साल बाद नीतीश सरकार की विदाई होने जा रही है। अगर 10 नवंबर को वोटों की गिनती के बाद वास्तविक रिजल्ट एग्जिट पोल के अनुरूप आते हैं तो एक बात साफ हो जाएगी कि लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के प्रमुख चिराग पासवान इस बार के विधानसभा चुनाव के किलर साबित होंगे। अगर एग्जिट पोल सही साबित होते हैं तो चिराग पासवान वो काम कर देंगे जिसकी कोशिश उनके पिता 2005 से करते आ रहे थे। एग्जिट पोल की मानें तो इस बार के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने नीतीश कुमार और एनडीए को भारी नुकसान किया है। ज्यादातर एग्जिट पोल का विश्लेषण करने पर यही पता चलता है कि जिन सीटों पर एलजेपी के प्रत्याशी थे वहां एनडीए के प्रत्याशी को महागठबंधन से करीब पांच फीसदी कम वोट मिले। वहीं जिन सीटों पर एलजेपी के प्रत्याशी नहीं थे वहां एनडीए को महागठबंधन से करीब 7 फीसदी ज्यादा वोट मिलने का अनुमान है। बता दें कि एलजेपी ने भाजपा के खिलाफ अधिकतम सीटों पर प्रत्याशी नहीं उतारे थे। एलजेपी जेडीयू के खिलाफ मजबूती से चुनाव में उतरी थी। अनुमान है कि जेडीयू प्रत्याशी वाले सीट पर एलजेपी ने 12 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किए हैं, जो हार जीत का अंतर तय करने के लिए पर्याप्त है। इस वजह से एनडीए को भारी नुकसान दिख सकता है।
रामविलास पासवान 2005 से ही कोशिश में थे कि वह नीतीश कुमार को सत्ता से दूर करें। 2005 के मार्च में हुए चुनाव के बाद रामविलास पासवान ने 29 सीटें आने पर नीतीश कुमार को समर्थन करने से मना कर दिया था। हालांकि इसके बाद कोई ऐसा मौका ही नहीं आया जब रामविलास पासवान नीतीश को किसी प्रकार से डैमेज कर पाएं। 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को रोकने के लिए रामविलास पासवान ने लालू यादव से हाथ मिलाया था, लेकिन वह अपने मंसूबे में सफल नहीं हो पाए थे। इसके बाद 2015 के विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार को रोकने के लिए रामविलास पासवान ने भाजपा के साथ मिलकर जोर लगाया था लेकिन वहां भी नाकामी हाथ लगी थी।
अगर एग्जिट पोल की ही तरह वास्तविक परिणाम आते हैं तो साबित हो जाएगा कि नीतीश कुमार को सत्ता से दूर रखने में चिराग पासवान सफल साबित होंगे। हालांकि चिराग की पार्टी का खुद का प्रदर्शन खास सुधरता हुआ नहीं दिख रहा है लेकिन उनका असली मकसद नीतीश को सत्ता से बेदखल करना रहा है जिसमें वह सफल होते दिख रहे हैं।
पिछले दो दशकी की राजनीति पर गौर करें तो नीतीश कुमार बिहार की पॉलिटिक्स के वे योद्धा हैं जिनके बिना कोई भी सत्ता का स्वाद नहीं चख पाया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी की लहर में प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली बीजेपी भी 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के सामने हार गई। बिहार की सत्ता में बने रहने के लिए बीजेपी को दोबारा से नीतीश का साथ लेना पड़ा। 2015 में ही लालू यादव जैसे बड़े वोट बैंक वाले नेता को भी 10 साल के सत्ता वनवास को दूर करने के लिए नीतीश से हाथ मिलाना पड़ा। जिस नीतीश कुमार के सामने मोदी और लालू जैसे राजनेता की दाल नहीं गल पाई, अनुमानों में उन्हें चिराग पासवान धराशायी करते दिख रहे हैं। चिराग पासवान शुरू से ही कहते रहे हैं कि उनका मकसद नीतीश कुमार को सत्ता से दूर करना है, जिसमें में वह सफल होते दिख रहे हैं। हालांकि ये तमाम बातें एग्जिट पोल को आधार बनाकर कही जा रही है, फाइनल और वास्तविक रिजल्ट 10 नवंबर को आएंगे जिसके बाद ही साफ हो पाएगा कि चिराग पासवान बिहार की राजनीति के जॉइंट किलर साबित होंगे या नीतीश कुमार ही अजेय योद्धा बने रहेंगे।

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