कोरोना के मामलों में कमी या स्थिरता नहीं आने के बीच यह भी कहा जा रहा था कि आरटी-पीसीआर किट के जरिए इसकी जांच की जो कीमत तय की गई है, वह बहुत सारे लोगों को भारी पड़ रही है और इसमें कमी की जाए। हालांकि शुरुआती दौर में इसी जांच के लिए साढ़े चार हजार रुपए चुकाने पड़ रहे थे। शायद तब जांच के लिए आरटी-पीसीआर किट की उपलब्धता कम रही होगी और संक्रमण से बचाव के पूर्व-इंतजाम के मकसद से मामूली लक्षणों के दिखने पर भी काफी लोग इसकी जांच करवा रहे थे। लेकिन जांच किट की उपलब्धता और बढ़ते मामलों के थोड़ा काबू में आने के साथ-साथ इसकी कीमत में कमी की गई और फिलहाल आरटी-पीसीआर जांच के लिए बारह सौ रुपए चुकाने पड़ रहे हैं। अब दिल्ली सरकार ने इस दर में भी कमी की है और जांच की कीमत आठ सौ रुपए तय कर दी गई है। हालांकि लक्षण वाले लोगों के घर जाकर सैंपल या नमूना लेने पर अब भी बारह सौ रुपए ही चुकाने होंगे।

संघर्ष-विराम समझौते का पालन क्यों नहीं
जम्मू-कश्मीर के सीमाई इलाकों में पाकिस्तान की ओर से जारी संघर्ष-विराम के उल्लंघन की घटनाएं चिंता पैदा करने वाली हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब पाकिस्तानी सैनिक भारतीय चौकियों और सीमा क्षेत्र के गांवों को अपना निशाना न बनाते हों। हालांकि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ऐसी गोलाबारी कोई नई बात नहीं है। पिछले कई सालों से पाकिस्तान अनवरत रूप से ऐसा कर रहा है। लेकिन जब अकारण हमारे जवान और गांवों में रहने वाले लोग पाकिस्तानी सैनिकों की इस हरकत का शिकार हो जाते हैं और जान गवां बैठते हैं, तो चिंता और आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है। यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर पाकिस्तान संघर्ष-विराम समझौते का पालन क्यों नहीं करता?

सावधानी की जरूरत
यह अच्छी और राहत देने वाली खबर है कि भारत में कोरोना संक्रमण की दर अब उतार पर है। ठीक होने वाले लोगों की दर ऊंची और दूसरे देशों की तुलना में मृत्यु दर काफी कम है। इससे कई लोग यह मान बैठे हैं कि कोरोना का प्रभाव अब खत्म हो रहा है। जबकि हकीकत यह है कि मौसम बदल रहा है, दिल्ली जैसे शहरों में प्रदूषण बढ़ रहा है, तब इस विषाणु के संक्रमण का खतरा अधिक है। विज्ञापनों और तमाम संचार माध्यमों के जरिए बार-बार समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस मामले में कोई भी लापरवाही खतरनाक साबित हो सकती है, पर उसका अपेक्षित असर नहीं हो पा रहा है। प्रधानमंत्री की बातों का लोगों पर असर पड़ता है, इसलिए उनके इस संबोधन के भी बेहतर नतीजे आने की उम्मीद की जा रही है।

आयुर्वेद की अहमियत
कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए सरकार ने देश की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को मान्यता देकर इस महामारी से निपटने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके लिए तौर-तरीकों संबंधी जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं, उनसे अब पूरे देश में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से भी कोरोना का इलाज संभव हो सकेगा। पिछले छह महीने के दौरान कोरोना संक्रमितों के इलाज के लिए सिर्फ एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति पर ही निर्भरता बनी हुई थी। चाहे संक्रमण हल्का हो या ज्यादा, हर मरीज को तय नियमों के मुताबिक सरकारी, निजी अस्पतालों और एकांतवास में भेजा जा रहा था। इससे लोगों के मन में खौफ ज्यादा बनता गया और लोग बीमारी को छिपाने लगे। हालांकि सरकार होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति को भी इस तरह की मान्यता दे चुकी है। देश में अभी जिस तरह से लाखों लोग संक्रमण का सामना कर रहे हैं, उसमें सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति के बूते हालात से निपट पाना संभव नहीं है।

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