नई दिल्ली । सजायाफ्ता नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने की पाबंदी वाली याचिका का केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में विरोध किया है। सरकार ने शीर्ष अदालत में उस याचिका का विरोध किया जिसमें आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए नेताओं (मौजूदा सांसद और विधायक सहित) के आजीवन चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाने की गुहार की गई है।
कानून मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा की जनसेवक और राजनेताओं में कोई अंतर नहीं है, लेकिन जनप्रतिनिधियों के सेवा नियम में इस तरह का कोई नियम नहीं है कि उन्हें चुनाव लड़ने वंचित किया जाए। मंत्रालय ने अपना जवाब भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा संशोधित आवेदन पर दिया है। आवेदन में कहा गया था कि जिस तरह से अपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद जनसेवक की सेवा आजीवन खत्म कर दी जाती है उसी तरह का नियम जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होना चाहिए। हलफनामे में कहा गया कि इस बिंदु पर शीर्ष अदालत द्वारा पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारत सरकार के मामले में विचार किया जा चुका है। इस मामले में जनप्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराए जाने के आधार तय किए गए थे।
– दोषी नेताओं पर केवल छह साल का प्रतिबंध:
फिलहाल जन प्रतिनिधित्व कानून,1951 के अनुसार दोषी ठहराए गए नेता को छह साल के लिए चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाता है। छह वर्ष की अवधि बीतने के बाद वे चुनाव लड़ने के योग्य हो जाते हैं।

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