नई दिल्ली। जलवायु खतरों की यदि इसी प्रकार उपेक्षा होती रही तो इससे 2050 तक विश्व अर्थव्यवस्था को 18 फीसदी की क्षति पहुंच सकती है। एक ताजा अध्ययन में यह दावा किया गया है, लेकिन भारत को यह क्षति कहीं ज्यादा 17-27 फीसदी तक हो सकती है। स्विस रे संस्था के अध्ययन में यह बात कही गई है। उसने अगले 30 वर्षों में जलवायु परिवर्तन से आर्थिक खतरों को लेकर एक दिलचस्प और अभूतपूर्व विश्लेषण प्रकाशित किया है। इसमें कहा गया है कि जलवायु खतरों से निपटने के लिए जिस कछुआ रफ़्तार से अभी दुनिया चल रही है, उस रफ्तार और इरादों से पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल कर पाना संभव नहीं है। बल्कि इस स्थिति में विश्व अर्थव्यवस्था का आकार 18 फीसदी तक सिकुड़ सकता है। रिपोर्ट में 48 प्रमुख उत्सर्जक देशों के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह नतीजा निकाला गया है। ये देश दुनिया की अर्थव्यवस्था की 90 फीसदी की हिस्सेदारी करते हैं। इनके आधार पर नतीजा निकाला गया है कि अमेरिका और ब्रिटेन को जीडीपी की 7 फीसदी, चीन को 15-18, फ्रांस को 10, भारत को 17-27, इंडोनेशिया को 17-30, जापान को 8-9 तथा आस्ट्रेलिया को 11-12.5 फीसदी की क्षति होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा किया जाता है और तापमान बढ़ोत्तरी को और अधिक सख्ती से सीमित किया जाता है तो हर देश अगले 30 वर्षों में बहुत कम आर्थिक क्षति का सामना करेगा। उदाहरण के लिए, यदि तापमान वृद्धि 2 डिग्री से नीचे सीमित रहे तो ब्रिटेन की जीडीपी को महज चार फीसदी का नुकसान होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा स्थिति में सदी के अंत तक तापमान बढ़ोत्तरी 3.2 डिग्री रहेगी। लेकिन यदि जलवायु रोकथाम के कुछ उपाय किए जाते हैं तो यह बढ़ोत्तरी 2.6 डिग्री की होगी और जीडीपी को क्षति 14 फीसदी होगी। लेकिन यदि ठोस प्रयास किए जाते हैं तो तापमान बढ़ोत्तरी दो डिग्री रहेगी और क्षति 11 फीसदी। यदि पेरिस समझौते के अनुरूप लक्ष्य हासिल होते हैं तो क्षति महज चार फीसदी होगी और तापमान बढ़ोत्तरी दो डिग्री से नीचे रहेगी।

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