नई दिल्ली। भाजपा भले ही जिला पंचायत चुनावों में विजय से गदगद है लेकिन सरकार और संगठन दोनों के लिए ये नतीजे एक सबक भी दे गए हैं कि बिना कठिन परिश्रम के कुछ भी हासिल होने वाला नहीं। भाजपा के लिए इस तथ्य पर भी नज़र रखना जरूरी होगा कि ये जीत सियासी दलों को रास नहीं आती या यूं कहें इनके नतीजे जनता के मूड का पैमाना नहीं होते। लब्बोलुआब यह कि पार्टी को मिशन-2022 में भी परचम फहराने के लिए कड़ी मशक्कत के साथ ही विपक्ष द्वारा खड़े किए गए मुद्दों की कड़ी चुनौतियों से भी जूझना होगा। अगर अतीत में हुए जिला पंचायत चुनावों और कुछ दिन बाद हुए विधानसभा चुनावों पर नज़र डालें तो स्थिति साफ होती है। पिछले जिला पंचायत चुनावों में समाजवादी पार्टी को वर्ष 2016 में करीब 63 सीटों पर जीत मिली थी। लगभग डेढ़ साल बाद 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी सिर्फ 47 सीटों पर सिमट गई। कुछ ऐसी ही स्थिति बसपा के साथ वर्ष 2011 में हुए चुनावों में हुई। बसपा को भी जिला पंचायत चुनाव में 57 सीटें मिली थीं लेकिन वर्ष 2012 आते-आते विधानसभा चुनावों में वह 79 सीटों पर रह गई। राजनीतिक विश्लेषक पूर्व आईजी अरुण कुमार गुप्ता कहते हैं-‘सत्ता में रहते हुए पंचायतों के इस चुनाव में उम्मीदवारों को सत्ता से कुछ पाने की उम्मीद रहती है। फिर भले ही निर्दलीय उम्मीदवार हों या अन्य दलों के सदस्य वे चाहत के फेर में सत्तापक्ष के साथ खड़े हो जाते हैं। इसे विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखना कतई भ्रम में रहने जैसा होगा। इससे जनता के मूड का कोई सही अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। अप्रैल व मई में कोरोना प्रबंधन के साथ ही आक्सीजन की कमी से उपजे असंतोष के बाद पार्टी ने कड़ी मशक्कत कर हालात संभाले। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने मंथन कर रणनीति बनाई। ‘सेवा ही संगठन’ जैसे अभियान के साथ ही बूथ-बूथ जाने के अलावा कोरोना में दिवंगत हुए लोगों के घरों पर जाकर सहानुभूति व्यक्त करने का सिलसिला शुरू कर संदेश देने की कोशिश की गई कि पार्टी उनके साथ है। ऐसे हालात में जिला पंचायत अध्यक्ष के 67 पद हासिल करना भाजपा की सरकार और उसके कार्यकर्ताओं के लिए ‘बूस्टर डोज़’ साबित हो सकता है। नि:संदेह विपरीत सी हो चली हवा में इन जीत ने भाजपा को कार्यकर्ताओं व समर्थकों के बीच सीना ठोंकने जैसी स्थिति में ला दिया है। इसके बावजूद पार्टी के लिए कड़ी चुनौतियां हैं-जैसे गांवों तहसीलों में सरकारी अमले को पूरी निष्पक्षता के साथ सक्रिय करना अब भी चुनौती बना हुआ है। पार्टी राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा की गई जमीन खरीद में कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर घिरी है। इसे लेकर पार्टी को विपक्ष के हमलों से न केवल दो-चार होना पड़ेगा बल्कि ज्यादा आक्रामकता से इन आरोपों को जवाब भी देना होगा। यही नहीं विभागीय खरीदों में भ्रष्टाचार के लग रहे आरोपों की भी काट पार्टी को तलाशनी होगी, ताकि मिशन-2022 की राह आसान हो सके।

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